Wednesday, 6 February 2013

आज के शिक्षक और मै :


·         मेरे दोस्त ने कहा - 
कुछ विधार्थी पर लिख दो ,

मैंने कहा पहले इनसे निपट लेने दो .. जो विद्या अर्थी बनकर लूट रहे है ....

आज तो शिक्षा और शिक्षक दोनों ही खरीदे बेचे जा रहे है ..
और जो शिक्षा पूरी तरह से बिक चुकी हो उसका कोई मतलब नही होता है ..
उसका कोई अर्थ नही निकलता है ..
उसे बढाने की चाह नही होती है..
उसे समझने की चाह नही होती है ...
मन ही मन घुटन होती है ...

"
वो शिक्षक क्या जो एकलव्य से उसका अगुठा ही मांग ले "
आज तो शिक्षक हर चौराहें पर मिल जायेगे पर उसके पास शिक्षा नही मिलेगी ...
  • आज मै एक सच बताता हु ...
    अपने जज्बात निकाल लाता हु ...

    मेरे बचपन में येसे शिक्षक होते थे ...
    जो साले क्लास में आकर सोते थे ...

    मेरी समझ में नही आता ...
    क्या ये रात को बीबी के बगल रोते थे ...

    इनको क्या बताये हम ...
    ये सही से कपडे भी नही धोते थे ...

    कुछ करे या न करे ...
    हमे ड्रेस के लिए धो देते थे ...

    एक दिन मुझे भी गुस्सा आया ..
    हरामी को क्लास में ही समझाया ...

    ये सब साले कुत्तो की पिल्लै थे ..
    जो जातिवाद सिखाते थे ...

    कुछ चमचे लड़के थे ...
    जिन्हें ये गले लगाते थे ...

    ये लडकियों पर नजर मिलाते थे ..
    उसमे ये थोडा भी न सरमाते थे ....

    ये हमें ज्ञान की जगह बट्टा देते थे ..
    ये मैडम को चिट्ठा देते थे ...

    ये कहानी नही हकीकत है ..
    ये झूठ नही हकीकत है ....

    ये मेरी ही नही तुम्हारी भी कहानी हो सकती है ..
    ये बचपन की निशानी हो सकती है ...

    एक दिन मुझे बड़ा गुस्सा आया ..
    मै 315 लेकर आया ...

    मन किया रोज रोज का झंझट मिटाऊ ..
    इसको मै सरपट हटाऊ ...

    कहानी बहुत बड़ी है ..
    "
    कृष्णा की कलम" चल पड़ी है ...

    आगे का किस्सा फिर बतलाउगा ..
    २-३ को सबक सिखलाउगा ...

    ::
    कृष्णा की कलम से ""

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