Sunday, 24 February 2013

क्या कभी गरीब की झोपड़ी बन पाएगी ?


****क्या कभी की गरीब की झोपड़ी बन पाएगी ????***
{दोस्तों में सोचता हू की ये मेरा आजतक का सबसे अच्छा लेख है अगर समय है तो जरुर पढ़े ..}

एक आदमी है जो हर सुबह उठता है ..
सुबह उठते है जाकर लाइन में लगता है किसी तरह लोगो के बीच से पानी का घड़ा भरता है .
फिर सिर पर रखकर उसे अपने घर लाता है और उससे नित्य क्रिया करता है ..
फिर भूखे पेट काम की तलाश में बाहर निकलता है ..
कही चौराहे पर खड़ा होता है या फिर किसी से पूछ कर कुछ काम लेता है ..
जाता है और दोपहर तक कड़ी धुप के बीच एक गधे से भी ज्यादा मेहनत करता है ..
और फिर जाकर उसके पेट में दुसरे का दिया हुआ कुछ अन्न जाता है ...
किसी दिन तो उसे ये भी नही नसीब होता है .. खाली पेट ही दिन भर काम करता है ..
और शाम को 100 -२०० रूपये मिलते है . फिर वो होटल में न जाकर चौराहे पर कुछ खरीद कर खा
लेता है .. और उसके मन को थोडा शान्ति मिलती है ..

काम के वक्त एक आदमी जो घर से भी खाकर आया है , उसमे अथाह ताकत है और हर घंटे में चाय
पी रहा है उसपर हुक्म चलाता है और बीच बीच में सही से काम न करने पर उसका पैसा काट लेने की धमकी देता है ..
किसी तरह वो बेचारा काम में लगा हुआ है शाम को घर पर पहुचने तक सिर्फ उसके पास कुछ ही रूपये बचते है , घर का सामान लेने के बाद और उन थोड़े से रूपए को वो अपनी जान से जाता संभालकर रखता है ..
धीरे धीरे 40- 50 साल तक वो इसी तरह से रोज काम करता है और कही एक झोंपड़ी बनाने में कामयाब होता है ..

फिर एक दिन बाद कुछ लोगो का जलसा निकलता है हाथ में लाल , पीले और हरे झंडे लिए हुए ..
कुछ लोगो के हाथ में लाठी डंडे और जलती हुई मशाल होती है ..
और देखते ही देखते उस गरीब की झोंपड़ी का नामोनिशान मिट जाता है ..
बेचारा गरीब चिल्लाता है और उसके पास न तो इन्सुरेंस के पैसे है और न थाणे जाने के लिए पैसे और
किसी का सपोर्ट है जिससे वो अपनी मदद कर सके ..
वो बहुत परेशान होता है और कुछ दिन बाद पता चलता है की उसने अपने लिए 50 रुपये का जहर खरीदा और खा लिया ..
बेचारा मर जाता है और उसकी बीबी के पास उसके कफ़न के लिए पैसे नही बचे हुए है ..
वो किसी तरह से लोगो को रो -रो कर कफ़न के लिए रूपये मागती है फिर भी लोग उसे झूठा समझते है और ठोकर मारकर भगाते है ..
कुछ लोग अच्छे भी मिलते है तो उसे ज्यादा से ज्यादा २ -5 रूपये की सिक्के देते है .. इस तरह उसे पूरा दिन भटकने के बाद 50 लोगो से भीख मागने के पास कुछ रूपये मिलते है जिससे वो उसे शमसान घाट  ले जाती है ...  वहां पर भी उसके पैसे कम पड़ जाते है तो उसे एक दिन वहां मजदूरी करने के लिए वादा करना पड़ता है ..
और किसी तरह से उस मेहनती आदमी का दाह संस्कार होता है ... 

और इसी का उल्टा है उस आदमी के पास जिसके घर या इमारत बनाने में इस आदमी ने  अपनी पूरी मेहनत लगा दी थी  आज उसकी इमारत गगनचुंबी है .. उसके पास अथाह रूपये है और बाद में उसका भी यही हाल होता है वो भी उसी शमसान में जाता है और वही पर जलाया जाता है ..
आधा जलता है और लाईट चली जाती है ..
फिर लाईट आती है और चली जाती है ..
जैसे तैसे उसका दाह संस्कार होता है और दोनों बाद में सिर्फ 500 ग्राम ही बचते है .. लेकिन आज भी उस गरीब के निशाँन उस इमारत में है और उसकी आत्मा को मुक्ति मिल जाती है .. लेकिन अमीर की आत्मा को कभी शान्ति नही मिलती उसकी आत्मा आज भी उसी इमारत के अगल बगल भटक रही है ..
और हजारो गरीब उस इमारत को ऊचा करने में लगे हुए है ..
और गरीब की झोपडी को जलाने के लिए लोग तैयार हो रहे है ...

क्या कभी की गरीब की झोपड़ी बन पाएगी ????

" कृष्णा की कलम से "

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