***** गांधी बनाम भगत सिंह
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{{एक तरह से कहू तो गाँधी भगत सिंह जैसे
क्रांतिकारियों से जलते थे .. नेता जी ने भरसक प्रयास किया था भगत सिंह की फासी को
रुकवाने क}}
जब 23 वर्ष के भगत सिंह शहीद हुए, उस वक्त गांधी जी की उम्र 62 वर्ष थी पर लोक
प्रियता के
मामले में भगत सिंह कहीं से कम नहीं थे. पट्टाभि सीतारमैया जैसे कांग्रेस के
इतिहासकारों ने कहा है कि एक समय भगत सिंह की लोकप्रियता किसी भी तरह से गांधी से
कम नहीं थी.
भगत सिंह युवाओं के बीच
देशभर में ख़ासे लोकप्रिय हो रहे थे. ब्रिटेन में भी उनके समर्थन में प्रदर्शन हुए
थे. भगत सिंह की यह बढ़ती हुई लोकप्रियता कांग्रेस को एक ख़तरे की तरह दिखाई देती
थी.
कई इतिहासकारों के मुताबिक
गांधी कभी नहीं चाहते थे कि हिंसक क्रांतिकारी आंदोलन की ताकत बढ़े और भगत सिंह को
इतनी लोकप्रियता मिले क्योंकि गांधी इस आंदोलन को रोक नहीं सकते थे, यह उनके वश में नहीं था. इस
मामले में गांधी और ब्रिटिश हुकूमत के हित एक जैसे था. दोनों इस आंदोलन को प्रभावी
नहीं होने देना चाहते थे.
इस मामले में गांधी और
इरविन के संवाद पर ध्यान देना होगा जो कि इतना नाटकीय है कि दोनों लगभग मिलजुलकर
तय कर रहे हैं कि कौन कितना विरोध करेगा.
दोनों इस बात पर सहमत थे कि
इस प्रवृत्ति को बल नहीं मिलना चाहिए. भेद इस बात पर था कि इरविन के मुताबिक फाँसी
न देने से इस प्रवृत्ति को बल मिलता और गांधी कह रहे थे कि फाँसी दी तो इस
प्रवृत्ति को बल मिलेगा.
गांधी ने अपने पत्र में
इतना ही लिखा कि इनको फाँसी न दी जाए तो अच्छा है. इससे ज़्यादा ज़ोर उनकी फाँसी
टलवाने के लिए गांधी ने नहीं दिया. भावनात्मक या वैचारिक रुप से गांधी यह तर्क
नहीं करते हैं कि फाँसी पूरी तरह से ग़लत है.
गांधी ने इरविन के साथ 5 मार्च, 1931 को हुए समझौते में भी इस
फाँसी को टालने की शर्त शामिल नहीं की. जबकि फाँसी टालने को समझौते का हिस्सा
बनाने के लिए उनपर कांग्रेस के अंदर और देशभर से दबाव था.
अगर यह समझौता राष्ट्रीय
आंदोलन के हित में हो रहा था तो क्या गांधी भगत सिंह के संघर्ष को राष्ट्रीय
आंदोलन का हिस्सा नहीं मानते थे.
गांधी की बजाय सुभाषचंद्र
बोस इस फाँसी के सख़्त ख़िलाफ़ थे और कांग्रेस में रहते हुए उन्होंने गांधी से परे
जाकर इस फाँसी के विरोध में दिल्ली में 20 मार्च, 1931 को एक बड़ी जनसभा भी की.
इस सभा को रुकवाने के लिए
इरविन ने गांधी को एक पत्र भी लिखा था कि इस सभा को रुकवाया जाए पर सुभाष चंद्र
बोस गांधी के कहने से कहाँ रुकने वाले थे.असलियत तो यह है कि भगत सिंह हर हाल में
फाँसी चढ़ना चाहते थे ताकि इससे प्रेरित होकर कई और क्रांतिकारी पैदा हों. वो कतई
नहीं चाहते थे कि उनकी फाँसी रुकवाने का श्रेय गांधी को मिले क्योंकि उनका मानना
था कि इससे क्रांतिकारी आंदोलन को नुकसान पहुँचता.

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