Sunday, 3 March 2013

चौरीचौरा काण्ड : गाँधी संत या कंस


  • 4 फ़रवरी 1922: चौरीचौरा काण्ड
    संत या कंस ||गाँधी की भी एक सच्चाई जरुर पढ़े ||

    चौरी चौरा, उत्तर प्रदेश में गोरखपुर के पास का एक कस्बा है जहाँ 4 फ़रवरी 1922 को भारतीयों ने
    बिट्रिश सरकार की एक पुलिस चौकी को आग
    लगा दी थी
    जिससे उसमें छुपे हुए
    22 पुलिस कर्मचारी जिन्दा जल के मर गए थे। इस घटना को चौरीचौरा काण्ड के नाम से जाना जाता है। इसके परिणामस्वरूप गांधीजी ने कहा था कि हिंसा होने के कारण असहयोग आन्दोलन उपयुक्त नहीं रह गया है और उसे वापस ले लिया था।

    इस घटना के तुरन्त बाद गांधीजी ने असहयोग आन्दोलन को समाप्त करने की घोषणा कर दी। बहुत से लोगों को गांधीजी का यह निर्णय उचित नहीं लगा। विशेषकर क्रांतिकारियों ने इसका प्रत्यक्ष या परोक्ष विरोध किया। गया कांग्रेस में रामप्रसाद बिस्मिल और उनके नौजवान सहयोगियों ने गांधीजी का विरोध किया। १९२२ की गया कांग्रेस में खन्नाजी ने व उनके साथियों ने बिस्मिल के साथ कन्धे से कन्धा भिड़ाकर गांधीजी का ऐसा विरोध किया कि कांग्रेस में फिर दो विचारधारायें बन गयीं - एक उदारवादी या लिबरल और दूसरी विद्रोही या रिबेलियन। गांधीजीजी विद्रोही विचारधारा के नवयुवकों को कांग्रेस की आम सभाओं में विरोध करने के कारण हमेशा हुल्लड़बाज कहा करते थे।
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    फरवरी, 1922 को चौरीचौरा थाने के बड़े दारोगा गुप्तेश्वर सिंह ने सदल बल वहां पहुंच कर वालन्टियरों की खुलेआम पिटाई प्रारंभ कर दी। इस घटना के प्रतिक्रियास्वरूप बड़ी तादात में वालन्टियर्स की सभा डुमरी में बुलाई गई। स्थानीय नेताओं ने इस सभा को संबोधित किया। इसके उपरांत यह जुलूस चौरीचौरा के लिए प्रस्थान किया। थाने पर पहुंच कर जुलूस रुका और जुलूस का नेतृत्व कर रहे लोगों ने बर्बरतापूर्ण आचरण के लिए थानाध्यक्ष का स्पष्टीकरण मांगा। कुछ शांतिप्रिय और प्रबुद्ध व्यक्तियों की मध्यस्थता के बाद जुलूस शांतिपूर्ण ढंग से आगे बढ़ गया। जुलूस थोड़ी दूर ही आगे बढ़ा था कि इसके पिछले हिस्से में भगदड़ मच गई और शोरशाराबा और क्रंदन के स्वर सुनाई पड़ने लगे। पुलिस कर्मियों द्वारा सत्याग्रहियों के साथ दु‌र्व्यवहार किया गया। जिसकी प्रतिक्रियास्वरूप भीड़ पीछे लौट पड़ी और पुलिसजनों पर पथराव करने लगी। जवाबी कार्यवाही के रूप में पुलिस ने गोलियां चलानी प्रारंभ कर दी। जिसके परिणामस्वरूप घटनास्थल पर ही 260 व्यक्तियों की मृत्यु हो गई। पुलिस की गोलियां तब रुकीं जब उनके सभी कारतूस समाप्त हो गए। वालन्टियर्स के धैर्य का बांध टूट चुका था। क्योंकि उनकी आंखों के सामने अपने साथियों के रक्तरंजित शव पड़े थे और अपने घायल साथियों के लहू-लुहान जिस्म दर्द से तड़प रहे थे। सत्याग्रहियों ने पुलिसजनों को थाने से बाहर निकलने के लिए ललकारा। पुलिसवाले भाग खड़े हुए और थाने के अन्दर घुसकर दरवाजा अंदर से बंद कर लिया। उग्र जुलूस ने थाने को आग लगा दी। फलस्वरूप अंदर मौजूद सभी 23 पुलिसकर्मी जल कर राख हो गये।}}

    इसके बाद शुरू हुआ पुलिस का तांडव नृत्य। चौरीचौरा और आसपास के क्षेत्र में लोगों के मकान जलाये गये, लोगों के खेतों में आग लगा दी गई। चौरीचौरा काण्ड में कुल 232 व्यक्तियों के खिलाफ आरोप पत्र न्यायालय में प्रस्तुत किये गये। जिसमें से 226 मामलों को सेशन को सुपुर्द किया गया। दो सत्याग्रहियों की मुकदमें के दौरान मृत्यु हो गई। मुकदमें के ऐतिहासिक फैसले में 172 व्यक्तियों को सजा-ए-मौत सुनाई गई। जिन्हें हम आज देशभक्तों के रूप में याद करते हैं।

    येसे क्रांतिकारीयो को गाँधी जैसे अंग्रेज के दलाल ने अल्लड और हुल्लड़बाजी वाले गया ...
    अब आप बताओ गाँधी देश भक्त या गद्दार ..
    संत या कंस ||

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